Sunday, September 22, 2013

रंगबिरंगी रोटियाँ


Based on Indian political system, this poem explains the offerings promised by our political leaders and,
 our helplessness to accept them.



रोटियाँ पड़ी है  रंगबिरंगी , चुनने की मजबूरी है । 

हर    दाने में  लिखा है खाने वाले का नाम ,
 यहाँ तो खिलानेवालो ने अपने मुहर लगाये है । 

कोई हरा, कोई लाल , कोई केशरिया  लेकर  आया है ,
रंगो की  इस बारिश में, कुछने तो हर रंग  पाया है ,
फिर भी कहते हम एक रंग के , ऐसी दुविधा में फंसाया है । 

हम  क्या चाहते नहीं पूछा ,  सब अपना  राग ही गाते है ,
चोर-चोर मौसेरे भाई , वो हमे ही ये  सिखलाते है । 

हास्यापद है जो ,वो बार बार   दोहराते है ,
शियार और गीदर के झगड़े में ,
शेर-चीते मात खाते है । 

कौवे नोचते बोटियाँ ,  इधर की उधर फैलाते है ,
हाथ लगे जितना जिधर से , झटपट समेटते जाते है ,

राहगीरोँ को बहला फूसला  कर, अपनी राह बनाते है,
भूखे है खुद ना  जाने किसके , और हमे दाने  गिराते है ,

  रोटियाँ पड़ी है  रंगबिरंगी , चुनने की मजबूरी है । 

                                             -आदित्य कृष्ण

Thursday, September 12, 2013

A distance to cover

"Two faces, single country
 one growing up, another in foundry"




It was high, touching the sky
Buildings and malls, so Hi-Fi.

Number of brands with varying price tags
Vehicles on roads, with prosperity flags.

Looking forward with opportunities
Children streamlined, youth on duties.

Wow ! growing India really so well
Wait....
I have another one to detail.

My village
 on Indo-Nepal border
got a lot to bother.

Small houses made of grass and mud
No electricity and roads disappeared.

Children and youth, why so aimless ?
No one is there to teach and address.

No brand to choose, No price tag to hover
clothes are there, just to cover.

They grow the crops, but floods take the toll
No hospital for emergency enroll.

I visited both in the same sunshine
Earlier unaware, noticed this time.

Two faces,single country
one growing up,
another in foundry.

I worry, who will bring them together
Still, we have a long distance to cover.

                                       -Aditya Krishna

Monday, September 9, 2013

राही

photo Courtesy- 


  कदम उठाये तो डगमगाया ,
चलने लगा तो लड़खड़ाया 
कुछ हाथ थे थामने कोकुछ दिवार पीठ टिकाने को,

आँख उठाई सिर्फ  रास्ते थे ,
कुछ सीधे कुछ मुड़ते ,कुछ सपाट,
 कुछ चढ़ते  उतरते और पथरीले ,

क़िताबो की कहानियो नेअन्तर्नाद  ने ,कहा तुम अलग हो,
जो नई दिशा ढूंढ़ते हैपैरोँ  के निशान छोड़ते है  
शुमार उनमे हो तुम । 

सब छुटे पीछेमै  चला अकेला 
खुद को जुदा तो पाया पर डर था
संकोच भी और खुद को भरोसा दिलाना था ,

सूरज की जलन नेहवा की सिहरन ने ,
और तीर की तरह चुभते शब्दबाणो  ने  ,
मेरे पथ की पहचान करायी ,

दिल में भूचाल है, 
सोच नयी, कुछ  करने का उबाल है 

असंभव अब वापस  लौटना ,
मै राही अब बिलकुल तैयार हूँ  । 
             -आदित्य कृष्ण


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